Friday, 20 July 2012


 कहाँ है वह तलवार जो मुझे मार सके ? कहाँ है वह शस्त्र जो मुझे घायल कर सके ? कहाँ है वह विपत्ति जो मेरी प्रसन्नता को बिगाड़ सके ? कहाँ है वह दुख जो मेरे सुख में विघ्न ड़ाल सके ? मेरे सब भय भाग गये | सब संशय कट गये | मेरा विजय-प्राप्ति का दिन पहुँचा है | कोई संसारिक तरंग मेरे निश्छल चित्त को आंदोलित नहीं कर सकती | इन तरंगों से मुझे ना कोई लाभ है ना हानि है | मुझे शत्रु से द्वेष नहीं, मित्र से राग नहीं | मुझे मौत का भय नहीं, नाश का ड़र नहीं, जीने की वासना नहीं, सुख की इच्छा नहीं और दुख से द्वेष नहीं क्योंकि यह सब मन में रहता है और मन मिथ्या कल्पना है

Where is the sword that can kill me? Where is the weapon that can wound me? Where is the calamity that can vitiate my cheerfulness? Where is the sorrow that can destroy my happiness? Now all fears have disappeared. All doubts have vanished. My day of triumph has arrived. No worldly event can disturb the tranquil state of my mind. I do not lose or gain anything on account of these worldly ups and downs. I have neither hatred for enemies nor love for friends. I am not afraid of death, nor scared of destruction. I have no passion for life, no desire for pleasure, no fear of pain, because all this is in the mind and mind itself is but an illusion.

  - Pujya Asharam Ji Bapu

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